Tuesday, 26 August 2008
दामिन-इ-कोह
अपना समाज
दामिन-इ-कोह की।
जीवन एक सुत्र में बंधा था ।
भूल जाऐगे- जंगत के र्दद
बन कर रहेगें राजा-रानी
जंगल के साथ।
कंठ से निकलते मधुर गीत।
स्वपन सुखी समृद्ध समाज का
दिनचर्या होती शुरू।
मुर्गी की बांग से।
जंगल में पैर ना रखा हो इंसान
हुआ था तैयार घने जंगल में
घास- पूस,दीवारो का छोटा सा
गाव संथाल का।
रंग -बिरगी जंगली जानकरों
फूलो तितली के चित्र।
मेहनत खुले आसमान के नीचे
कंद मूल इकट्ठ कर।
शाम को घर को लौटते।
जो मिला खाकर भूख शांत करते।
शुरू होता समूह में गाना, बजाना।
फिर आराम।
कहां गया?
दामिन-इ-कोह के अपना राज।
वारिश के बुंद।
Aloka
हर बुंद में है संवाद।
वह कुछ कह रहा।
उसके शब्दा को समझों
वारिश की बुंद।
कुछ अवश्य कह रही
तु प्यास से सुन।
वो बंदे कुछ कह रहा
शायद अहिमयत बता रहा
हर बुंद
एक स्थान मे मिलने की
बात वह कह रहा
शायद वह उपयोग
वारिश के बुंद ।
मेरे कानो को कह रहा।
मुझे एक जगहा
कई कामों मेंं
उपयोग कर
वारिश के बुंद
जब कटोर धरती में
ये बूदं टकरा कर टुट जाते है।
Monday, 25 August 2008
मुलाकात के बाद।
अलोका और फरहद
एक लम्बे इन्तजार के बाद
मिले है हम दोनो
दर्द भरे नगमो के साथ
इसमें ढ़ढते है दो पल खुशियां
खिल उठाता है चमन अपना
एक लम्बे इन्तजार के बाद
सिसकते अरमान को बाटते हम
टुटे फुटे शब्दो के साथ
सुनहरे ख्वाब सजाते है हम
टुटे हुए सितारों के साथ
ये पल अभी अपना है
कल का पल अपना हो ना हो
इस लम्हा को कैद कर लेते
हम दोनो
अपने डायरी और कलमो के साथ
ज्जबात की कहानी।
दो यारों की जुबानी।
फकत कहते है।
दर्द ए हेयात की कहानी
डुबी हुई कस्तियां
ढ़ढती है अपनी ही कहानी।
गम इस दिल में लगाया।
अपने ही दर्द को सहलाया ।
अपने डुबे कस्ती को उठाया।
संसार डिगा न सका।
दोनो यारो की वफा कि निशानी
इस दिल में हैं इतनी जगहा।
जिसमें समा सकता है दो।
यारो कि वफा
जिसमे होगी ।
ज्जबात की कहानी।
दो यारो की जुबानी।
तीसरी दुनिेया की तीसरी दुकान।
इस दुकान में क्या- क्या न बिकता।
मानव को इंडिजिनश पियूपल बना देता।
हिन्दी को अग्रेजी बना डाला।
संधर्ष की दुकान चलाया ।
मनुष्य को रंग के अनुरूप।
मैटर बना कर बेच आया।
किमत किससे ज्यादा मिलेगी।
उस भाषण को किताब बनाया।
बैनर पर संस्कृति परम्परा का
प्रोडक्ट लोंच होने का सकेत दे आया।
मानव को फेक्ट्री की तरह
वो इस्तेमाल कर आया।
ग्रामीण बोली हीरा बना।
पहले दुकान आंदोलन का चला।
धीरे- धीरे बच्चे भी उसमें शमिल होते गये।
शिक्षा का महत्व रूप के अनुरूप बना।
पलायन तो कोडी के भाव बिका।
डायन हत्या का मूल्य निधारित नही
अब कचडा साफ कराने में दो करोड़ कमा चुके
स्वास्थ्य विषय बड़ा पुराना है।
इसका बाजार निराला है।
एक नया प्रोडक्ट और लांच हुआ।
मुद्दा बना जंगल का।
देश के कोने -कोने में खोला बड़ा बाजार।
लाखो लोग ने जमकर कमाया।
अब तक न एक पेड़ बचाया।
नारा बना जंगल कटने से
वारिश पर हुआ असर
और खुला एक नया दुकान।
पानी-पानी-पानी का
एक को राहत अब तक न मिली
पानी के बिन जनता लड़ पड़ी।
मुद्दा बना चुनाव का ।
कौन प्रोडक्ट अच्छा है।
किसमें किमत ज्यादा है।
जिसका संबध फाॅरन से है।
लांच कराने वाले सब जानते है।
बड़ी दुकान बड़ा दाम।
छोटी दुकान छोटा दाम।
मेहनत मजदूर कहता एक समान।
फिर भी करता जनता का सम्मान।
तीसरी दुनिया का तीसरी दुकान।
उस दुकान को मेरा सलाम।
चेयरमैन माओ
अलोका
प्रिय माओ,
जोहार!
एक समय था,
जब सड़कों की दीवारों पर पैबस्त रहता था
चीन का चैयरमैन हमारा चेयरमैन
हसंते थे कुछ लोग
कुछ देते थे गाली भी
मैं नहीं जानता, माओ !
वो ठीक थे या ये
मगर आज कुछ ठीक नहीं है तेरे बगैर
चीन में सब बदल गया,
मगर नहीं बदला, तो मजदूरों की बदली हुई किस्मत
आज झारखंड में तुम्हारे और गांधी के गाने वाले
हर दिन सड़कों पर मिल जायेंगे
मगर उनमें
तुम तो कहीं भी नहीं दिखते
झाड़खण्ड से बिरसा को भी दे’ा निकाला दे दिया है
मगर बिरसा के गीत हर बार बज जाते हैं
बिरसा और तुम्हारे लोग
बहला दिये गये हैं
वो जानते हैं चेग्वेरा व तुम्हारे टी’ार्ट पहने वाले
फ्रेंच कट दाढ़ी वाले
सिगरेट हाथों में लिये
रोज तुम्हें बेच आते हैं वल्र्ड बैंक के हाथों
फिर भी खोज रहे हैं तुम्हें
लोग
तेरी रचनाओं से दूर
उनकी सपनों की दुनिया में
एक चेहरा है
जो तुम्हारी तरह ही लगता है
और
अंधेरे में झलक उठता है हर चेहरा
जिस पर लिखा होता है
हां! चुप रहो,
कुछ नहीं होगा तुमसे
झोला उठा लो अपना
चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन
प्राकृति
अलोका
प्राकृति से लगाव।
इसका अर्थ दुसरा है।
मैं प्राकृति के धुन
और गीत सुनती हूं।
झरने चलते जाते हैं।
छोडते जाते है शब्द ।
तान होती उसमें
गुजरते है जहां से
वातावरण जाता है। बदल-बदल सा
हर मोड पर
सभी के लिए।
धुन और तान एक समान है।
हवा भी साथ मेंतान मिलाती है
मानों पत्थर पर टकरा कर नये
सुर ताल बिखेर रहे हो।
लगता है मांदल पर
किसी ने कम्पन्न
पैदा कर दी हो।
पक्षी भी अपने
स्वर रोक नही पाते।
हर कोई की अपनी वाणी।
पिरोये होते सुर में ।
वृक्ष भी इस तान से
दुर नही रह पाता ।
मानों समूह के साथ
अपना स्वर मिला रहा
झिंगूर(कीडे+) भी धरती के
अन्दर स्वर मिलाते है।
जब पूरी वादी एक साथ
झुमर गीत का तान छेड चुका हो
हर कोई अपनी उपस्थिति दर्ज
वहां करा जाते है
यह भी एक युद्ध जैसा ही है।
वे अपने गीतों के माघ्यम से
एकता का ऐलान कर रहा।
खजूर की चटाई।
अलोका
नानी के गांव में
खजूर क पत्ते
और उसकी चटाई
आज जीवित है
सदियों के बाद सर्दियों में
ओढ़ने बिछाने के लिए
मेहमानों के स्वगत के लिए
सम्मान पूर्व बैठने के लिए
आंधी तूफान में खोजते खजूर की चट्टाई
बरसात की झड़ी में
ढ़कने के लिए है मात्र
खजूर की चटाई।
चटाई हर किसी के पास
खलिहान में बैठने की इच्छा
चटाई मिट्टी के उपर डाल
इतमिनान से बुढ़ी औरतें
जीवन को गाते- सुनाते
खजूर के पेड के पत्ते से अनुभव
शहर वापस आते वक्त
चटाई की सुगन्ध
महसूस करते है हम
खजूर की चट्टाई
दिसंबर की रात
जाड़े के साथ
नानी पास होती
खजूर की चटाई
ढ़क कर हमें सुलाती
कंप कपी के ठंड़
बढ़ता था रातों कों
चूल्हे पर लकड़ी
जला कर ठंड सेलडाई,
साथ में खजूर की चट्टाई
आंधी रात को
गांव के सब लोगों ने
खजूर की पत्ती के साथ
जीवन जीना सीख लिया था।
जब मै बड़ी हो गयी
याद करते है।
अपने नानी घर कि कथा
महसूस करते
उस गांव के मुगी- मुर्गी।
पक्षी और घास के दिन
बेल आम कि महक याद आती है।
याद आती है खजूर की चटाई
मूढ़ी का पाइला।
अलोका
लगती है अच्छी
मूढ़ी वाली
चार पाइला मूढ़ी के बाद
भरी पोलोथिन मूढ़ी में
उपर से डाल देती है
एक मूट्ठी मूढ़ी
हालाकि यह चगनी मंगनी है
कि चार पाइला
मूढ़ी में थोड़ा हिल जाने पर
कुछ मूढि.यां गिर जाती है
ऐसा नही है
पाइला का माप कम हो जाता
फिर भी वो डाल देती है
उस पोलोथिन में मुट्ठी भर मूढ़ी
जैसे विवाह के बाद
बेटी की विदाई के वक्त
मां मुट्ठी भी चावल, हल्दी और दूब
खेाइछा देती है बांध
यह थोडा सा नहीे होता हैं
इसमे
प्यार आत्मीयता
गर्माहट और
‘’ाुभकामनाओं का
अनन्त संसार होता है
मुट्ठी भर प्यार
मुट्ठी भर गर्माहट
बस अब
मुट्ठी भर
अच्छे लोग।


