Monday, 25 August 2008

एक काॅमरेड का bhshan

अलोका
आज
भाषणआज की व्यवस्था पर अर्ज
तमतमाया हुए चेहरे
सेट पकने लगे है
शब्द और ध्वनि
मुट्ठी बन्द
तने हुए हाथ
तलवार से कम नहीं वाणी की धार
खुलने का नाम नहीं लेती मुट्ठी
खत्म होने का नाम नही लेते
खौलते शब्द विचार
विचारों के पसीने से परीजता
सफेद कुरते का काॅलर
बढ़ी रही शरीर की थरथराहट
चेहरे की तमतमाहट‘ शब्दों की धार
अब साम्राज्यवाद पर हमला तय है।

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